विज्ञान: पूर्वी कैलिफ़ोर्निया की पहाड़ियों में पत्थरों से भरी एक ढलान पर एक टेढ़ा-मेढ़ा वृक्ष आकाश की ओर मुड़ा खड़ा है। यह है मेथुसेलह
मनुष्य जहाँ कुछ दशकों तक जीवित रहता है, वहीं ऐसे वृक्षों की हजारों वर्षों की आयु समझ पाना कठिन है। लेखक और उद्यान विशेषज्ञ क्रिस्टोफर वुड्स अपनी पुस्तक “In Botanical Time” में ऐसे ही प्राचीन पौधों की जीवन यात्रा और उनकी दीर्घायु के वैज्ञानिक रहस्यों को उजागर करते हैं।
वुड्स के अनुसार, लंबी आयु का एक बड़ा रहस्य है — धीमी गति से विकास करना। उदाहरण के लिए, मेथुसेलह लगभग 2.5 सेंटीमीटर प्रति शताब्दी की दर से बढ़ता है। इतनी धीमी वृद्धि उसे अपनी ऊर्जा को कठोर ठंड, पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी और तेज़ हवाओं से जूझने में मदद करती है। साथ ही, समय के साथ ऐसे आनुवंशिक परिवर्तन भी इकट्ठा होते रहते हैं जो उसे रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं।
कुछ प्राचीन पौधे एक अलग रणनीति अपनाते हैं — क्लोनिंग। क्लोनल पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से अपनी ही प्रतिलिपि तैयार करते हैं। भले ही मूल तना नष्ट हो जाए, जड़ प्रणाली से नया तना उग आता है और जीवन चक्र चलता रहता है।
स्वीडन में पाया जाने वाला एक नॉर्वे स्प्रूस (Picea abies) लगभग 9,500 वर्षों से स्वयं को क्लोन करता आ रहा है, हर कुछ शताब्दियों में अपनी जड़ों से नया तना उगाकर। इसी तरह अमेरिका के यूटा में स्थित पैंडो नामक क्वेकिंग ऐस्पन (Populus tremuloides) का विशाल उपवन देखने में 47,000 अलग-अलग पेड़ों जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में वह एक ही जीव है जिसकी जड़ प्रणाली लगभग 14,000 वर्ष पुरानी है। नए पौधे उसी जड़ से निकलते हैं और सभी आनुवंशिक रूप से एक समान होते हैं।
इस प्रकार, चाहे धीमी वृद्धि हो या क्लोनिंग की अनोखी प्रक्रिया — धरती के ये प्राचीन पौधे मृत्यु को मात देकर समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं और आज भी प्रकृति के अद्भुत चमत्कार बने हुए हैं।
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